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पंजाब के उपभोक्ता मनपसंद कंपनी से ले सकेंगे बिजली

ब्यूरो रिपोर्ट :7 मार्च 2018
संसद में बिजली एक्ट में संशोधन हुआ तो उपभोक्ताओं को कई कंपनियों का विकल्प मिल जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतिस्पर्धा बढ़ने से बिजली की दरों में कमी आ सकती है।
संसद के मौजूदा बजट सत्र में अगर बिजली एक्ट में संशोधन हुआ और कैरेज एंड कंटेंट को अलग-अलग करने का बिल पास हो गया तो उपभोक्ता टेलीफोन कंपनियों की तरह बिजली भी किसी भी कंपनी से ले सकेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतिस्पर्धा बढ़ने से बिजली की दरों में कमी आ सकती है। ऊर्जा मंत्रालय ने इसकी तैयारी कर ली है और बजट सत्र में बिल पेश किया जाना है।

यह बिल सरकारी बिजली निगमों का एकाधिकार तोड़कर प्राइवेट बिजली कंपनियों को भी यह अधिकार देगा कि वह उपभोक्ताओं को बिजली की सप्लाई कर सकें। घरों, फैक्ट्रियों, दुकानों आदि तक बिजली की सप्लाई को यकीनी बनाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर पावरकॉम या संबंधित राज्य सरकार के बिजली निगमों का ही होगा। इंफ्रास्ट्रक्चर का प्रयोग करने के लिए संबंधित राज्यों के बिजली निगमों को प्राइवेट कंपनियां या तो एक तय राशि देंगी या फिर प्रति यूनिट के हिसाब से भी पैसा दे सकती हैं।

बिजली विभाग के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी सतीश चंद्रा ने बिजली एक्ट में संशोधन होने की प्रक्रिया की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि इस संबंधी ऊर्जा मंत्रालय ने सभी राज्यों के बिजली मंत्रियों की फरवरी में मीटिंग भी बुलाई थी जिसमें कहा था कि बजट सत्र में बिजली एक्ट में संशोधन का बिल लाया जाएगा और कैरेज व कंटेंट को अलग-अलग किया जा सकता है, ताकि उपभोक्ताओं को कहीं से भी बिजली लेने का अधिकार मिल सके।

पहले से है एक्ट में व्यवस्था

उल्लेखनीय है कि बिजली एक्ट 2003 की धारा 42 की उपधारा 3 में कहा गया है कि उपभोक्ता किसी से भी बिजली खरीद कर सकते हैं लेकिन अभी तक कंटेंट यानी बिजली और कैरेज यानी वितरण के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर सरकारी निगमों के पास ही है। मुंबई व दिल्ली में कुछेक बड़ी प्राइवेट कंपनियों को काम दिया गया है लेकिन अभी भी मात्र एक ही कंपनी को वितरण के काम में लगाया है जबकि एक्ट में संशोधन करके ऐसी व्यवस्था की जा रही है कि कोई भी कंपनी वितरण का काम ले सकती है।

बिजली निगम आर्थिक संकट में

सरकारी बिजली निगम लंबे समय से आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। इनको इससे निकालने के लिए उदय योजना शुरू की गई थी लेकिन उससे भी ज्यादा सुधार नहीं हो पाया बल्कि राज्य सरकारें कर्ज के और बोझ के नीचे दब गई हैं। ऐसे में प्रतिस्पर्धा लाकर सरकारी निगमों को अपने कामकाज में सुधार लाने का एजेंडा आगे बढ़ाया जा रहा है।

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